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bok1

    Terrorist
    Fiction Short Stories
    Page: 111
    Price: Rs. 120
    ISBN: 81-86435-34-4
    Publisher: Shashi Prakashan Mandir,Bikaner

टेरेरिस्ट में लेखक ने जो कुछ संजोया है, वह रौंगटे खड़े कर देने वाला है. आतंकवाद में लोगों की मानसिक वेदना का सजीव व जीवंत चित्रण करता संग्रह काफी संभावनाएं लिए हुए है.
दैनिक जागरण, ४ अप्रैल २००१

समकालीन कहानी के क्षेत्र में अश्विनी आहूजा की रचनाधर्मिता देश में उत्तरोतर बढ रहे आतंकवाद और उससे पीड़ित व संतप्त परिवारों के मूक व अथाह दर्द को नापने का सही पैमाना है. उग्रवाद एक ऐसा पिशाच है जो हमारे जीवन, नैतिक मूल्यों, आस्थाओं व उत्साह प्रगति को लगातार निगल रहा है.  और इस पिशाच से मुक्ति का समाधान हमें कहीं भी दिखाई नहीं देता है. अश्विनी आहूजा की तीसरी कृति "टेरेरिस्ट" उग्रवाद से जुडी कहानियों के आतिरिक्त कुछ नया भी परोसती है. एक दो कहानियों को छोड़ कर शेष सब रचनायें नगरीय पृष्ठभूमि से जन्मी हैं. पारिवारिक बिखराव, मूल्यों का संघर्ष, अवसरवादिता, मधुरता एवं प्रेमभाव भी इन कहानियों के केन्द्र में हैं. संग्रह की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें न तो शुष्क कथ्य है और न ही वैचारिक दिवालियेपन  को छिपाने वाला व्यर्थ शब्द जाल और न ही सपाटबयानबाजी.  निरंतर पत्र पत्रिकाओं में छपते रहने वाले अश्विनी आहूजा के पास चाहे अनुभवों की पटरी नहीं है लेकिन भाषा की प्रौढ़ता एवं प्रवाह को देखते हुए ऐसा प्रतीत नहीं होता कि वह कहानी के क्षेत्र में नए हैं.  पत्रों के मन की ऊहापोह को कुशलता के साथ अपने लेखन में चित्रण करने वाले लेखक के पास सम्पूर्ण जीवन्तता है. आधुनिक सोच है. सही मुहावरा है और निश्चित दिशा भी. कुछ कर गुजरने की छटपटाहट  प्राय: उनकी कहानियों में में परिलक्षित होती है. सही दिशा बोध देने वाला अश्विनी आहूजा का "टेरेरिस्ट" कहानी संग्रह साहित्य जगत में निस्संदेह अपनी मंजिल तलाश लेगा.

उमा शर्मा
जनसंपर्क अधिकारी
संपादक जागृति, चंडीगढ़


टेरेरिस्ट...
रामदास औंधे मुंह चारपाई पर पड़ा था. पड़ा तो वह रोज ही रहता था लेकिन आज वह औधें मुंह लेटा पड़ा था. उसके चेहरे पर निश्चिंतता और संतोष का उजाला नहीं था बल्कि रेंग रहा था घुटा घुटा सा तनाव, आतंक की अजब सी चाय, दुष्ट मुस्कराहट और मरा हुआ सा आग्रह.  मरा हुआ सा आग्रह उनके प्रति जो उसकी बेटी को अपहृत कर ले गए थे. हुह! भडवे कहते हैं- हम मिलिटेंट. अरे सालों! तुम जैसे होते है मिलिटेंट, जो दूसरों की बहू बेटियों को उठाकर ले जाते हैं. फिरौती वसूलते हैं. कुत्तों, तुम तो उग्रवादी हो...बदमाश..मर्सनरीज, टेरेरिस्ट! पिछले एक साल से उसने अंग्रेजी ज्ञान का चाहे और कुछ सीखा हो या नहीं लेकिन दिल दहलाने वाले दो लफ्ज जरूर सीख लिए थे.
                        रामदास गहरी निद्रा में बडबडा रहा था. बडबडाने से ज्यादा कॉंप रहा था. जून का महीना था. गर्मी मुंह फाड़े हुए थी लेकिन उसकी कंपकंपाहट गर्मी के कारण नहीं न थी बल्कि वह एक भयानक सपना देखा रहा था. रात का सन्नाटा, नीरव अंधकार. निम्मो चारपाई से उठकर खिड़की का पल्ला खोलती हैं.  उमस बढ रही है. रामदास लेटे लेटे ही तकिये के नीचे से बण्डल उठाकर बीड़ी सुलगाता है. निम्मो घबरा जाती है. उसका दिल धाड़-धाड़ बज रहा है.
                       "उजाला क्यों करते हो? उजाला ही करना था तो पहले...उस दिन तुम्हारी यह मरजानी बीड़ी ही थी जिसने मेरी बेटी को मुझसे छीन लिया." रामदास एकाएक दीवार से रगड़ कर बीड़ी बुझा देता है. उसके चेहरे पर पराजय की विकृत छाया झनझना उठती हैं. बीड़ी सुलगाने से कितना उजाला होता है निम्मो की समझ से परे था. "तुमने खिड़की का पल्ला खोला ही क्यों? यह कोई टेम है" निम्मो घरे से पानी निकलते हुए एकदम रुक जाती है. तीखी नजरों से उसकी और देखती है.  "अभी बंद कर देती हूं. पता नहीं, तुम इतनी घुटन कैसे बरदाश्त कर लेते हो?"
                 निम्मो गुस्से में खिड़की का पल्ला जोर से भिड़ा देती है. ' बंद कमरे में तुम्हारी यह सुलगती बीड़ी मेरा दम निकाल देगी...और एक दिन तुम ताप से यूं ही मर जाओगे...देख लेना...

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