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    Kalam Ki Talaash Mein
    Poetry
    Page: 106
    Price: Rs. 60
    Publisher: Jai Shree Prakashan, Delhi

कलम की तलाश में

कवि और यह दुनिया
कवि, तुम कहाँ भटके हुए हो?
कहाँ अटके हुए हो?
सौन्दर्य तुम्हारा जीवन नहीं है.
अस्तित्व भी नहीं है.
हँसना तुम्हारे लिए निषेध है.

रोना सीखो! रोना!!
शायद दो चार कविताएँ बिक जाएँ.
क्योंकि दुनिया संवेदनाएं उडेलने में महारत हासिल किये हुए होती है.
अपनी सुन्दर प्रेरणा को रंडिया बबुआएन की तरह घुंघरू बंधवा कर बाज़ार ले जाओ
और कोठे पर बिठा दो
क्योंकि
दुनिया प्रेम का अर्थ नहीं समझती
जिस्म का मोल लगाना जानती है.
कवि! उन्नति करो, उन्नति!
अन्यथा तुम इस यंत्रणा के माहौल में
जिन्दगी की दौड़ में बहुत पीछे छूट जाओगें
कवि! झूठे आश्वासनों पर मुस्कान विखेरने का अभ्यास शुरू कर दो
और चमचागिरी की सब सीमायें लाँघ जाओ
शायद तुम बहुत बड़े मंत्री
या विधायक बन जाओ
क्योंकि चमचे ही अक्सर नेता बनते हैं.
और तमाम देश को हड़पते  हैं.
कवि! मरने के उपरांत भी उनकी कीमत जाती है.
समाधियों पर फूल मालाएं सजाई जाती हैं.
कवि! मात्र कवि होकर तुम इतनी उपलब्धियां नहीं बटोर सकते.

कवि! आगे बढ़ो, कुछ बनो.
तुम अभी तक कहाँ लटके हुए हो.
कवि! तुम कहाँ भटके हुए हो.
सौन्दर्य तुम्हारा जीवन नहीं है.
           (यह तो तुम्हारी कल्पना है)
हँसना तुम्हारे लिए निषेध है.

शिशु बोध
 
जब मैंने जनम लिया था
मेरी सांवली प्यारी सी माँ ने कहा था
मेरे लाल! मेरे राम दास!
भगवान सबके मन में वास करता है.
विश्वास ना हो तो पूछ लो,
किशन चंद की विधवा बहु जमुना से
उस जमुना से, जो बार बार मेरे गालों को चूमती थी. 
उस जमुना से, जो मुझे गाँव की पाठशाला
में दाखिल करवाकर आयी थी.
उस जमुना से, जिसे बापू रंडी कहा करता था.
उस जमुना से जो गाँव के कुएं पर पानी
भरने जाती थी, तो गाँव की स्त्रियाँ उसे
देखर थूकती थी.
रंडी! रंडी!!
मैंने बापू से पूछा- "बापू, रंडी क्या होता है?"
बापू बोला-"धत, नालायक!" 
मैंने माँ से पूछा-" माँ, रंडी किसे कहते हैं?

वह बोली-" बेशर्म, गालियाँ नहीं निकालते"
मैंने पाठशाला के अध्यापक से पूछा-" मास्टर जी,
रंडी क्या होता है?"
उन्होंने मेरे कोमल गाल पर जोर से थप्पड़ लगाकर कहा,
"तू किसकी औलाद है?"
"अपने बापू की"
"बापू कौन?"
"बापू जो होता है" मास्टर जी ने एक और थप्पड़ मारा
और मुझे भगा दिया.

मैंने बुआ जमुना से पूछा-" बुआ रंडी किसे कहते हैं?"
जमुना, किशन चंद की विधवा बहू जमुना ने,
मुझे छाती से सटाया, फिर कहा;
"बेटा, रंडी मुझे कहते हैं"
"क्यों?"
क्योंकि मैंने तेरे फूफा के मरने के तीन साल बाद एक लड़का जना था.
मैं सोचता हूँ फिर तो माँ भी रंडी है
उसने भी तो मुझे बापू के (पहले वाले)
मरने के तीन साल बाद ही जाना था.
जमुना बुआ ऐसा कहती है
जो माँ की तरह, सांवली सी प्यारी
माँ की तरह
यह कभी नहीं कहती कि
भगवान सबके मन में वास करता है.
    
प्रिय कविता को एक चिट्ठी
कविता!, ओ कविता!!
ओ कवि के अस्तित्व, नेह!
समर्पण!
तुम अपने प्रियतम कवि को
अनायास भुला बैठी हो
रूठी हो उससे
क्यों?
ओ अनुभूति की जननी!
क्यों!
ओ सर्जनात्मक संवेदना के प्रथम क्षण!
क्यों!
ओ भाव विश्व के ब्रह्मा!
क्यों?
तुम्हारी जिन्दगीं का हर प्रतिमान-
रस, छंद, लय, तुक
तुमसे विषाक्त सम्बन्ध
स्थापित करने को आतुर है.
और तुम उन्हें निरंतर पनाह देती रहती हो.
जो संवादहीनता की स्थिति से गुजरते हुए भी
बेबस व्यक्ति को सड़क पर नंगा खड़ा होकर
चीखने के लिए विवश कर देती है.
तब व्यक्ति , व्यक्ति न रहकर लोकतंत्र का गुम हुआ चेहरा
रह जाता है.
ओ शारदा की सुता!
ओ वीणावादिनी की कोख के बीज!
लौट जाओ! लौट जाओ!!
अपने विरही कवी की पास
अपने समर्पण का दुकूल ओढे
रस की रसना लिए
लय, तुक के अटूट अंगों के साथ
तुम्हारा कवि उदासीन है कविता!
ओ कविता! वह विकल है!
गुमसुम है!!
जानती हो क्यों?
इसलिए कि तुमने अपनी आत्मा की
हत्या कर दी है.
अपनी आत्मा संगीत की
प्रिय कविता! जाओ! उड़कर चली जाओ
अपने प्रियतम के पार्श्व में
एक नन्ही सी चिड़िया की मानिद
ओ चेतना का अनुजा!
छोड़ दो प्रपंच, सृष्टि की माया बंधन
बिना टांगों वाली राजनीति की जकड़न
इन सबने तुम्हारा भक्षण किया है.
सत्यानाश किया है.
प्रिय कविता!
लौट जाओ अपने कवि के पास. 

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