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    Ek Chuha Mara Hua
    Fiction Short Stories
    Page: 140
    Price: Rs. 50
    Publisher: Archna Prakshan, Delhi

एक चूहा मरा हुआ

चेयरमैन की कुर्सी हिल रही थी.
हिल नहीं रही थी बल्कि वे उसे हिला रहे थे, कुर्सी पर बैठे हुए, स्वयं हिलते हुए. कुर्सी के नितांत सामने एक मेज पड़ा था जिस पर सुंदर, कढा हुआ मेजपोश बिछा हुआ था. मेज के दायीं और नीचे जमीन पर अंग्रेजी-हिंदी अखबारों का मिला जुला पुलिंदा रखा था. मेज के ऊपर बाएं कोने में पड़े राखदान  में धुआं निकलता हुआ; चेयरमैन  की बड़ी-बड़ी परन्तु धंसी हुयी आँखों के आगे लेते हुए दी हिंदुस्तान के पन्नों को चीरता हुआ; छत को फाड़ने की कोशिश करता हुआ, कमरे के दायीं और वाली खिड़की के रास्ते से बाहर निकल रहा था जिसे कि चपरासी थोडी देर पहले किताबों वाली शेल्फ को वस्त्र से पोंछते हुए खोल गया था. कमरे के बाहर का कोलाहल चेयरमैन को बेहद कष्ट पहुंचा रहा था. लेकिन वे फिर भी अखबार पड़ने में तल्लीन थे. सामने का दरवाज़ा तो खुला था लेकिन अन्दर बैठे चेयरमैन को पास से गुजरता कोई भी व्यक्ति कोशिश करने पर भी नहीं देखा पाता था. कमरे दे दायीं ओर खिड़की के रास्ते से जब कभी समीर का झोंका कमरे की नीरवता को भंग करके किवाडों की बगल में लटकी चिलमन से अठखेलियाँ करता तब कही जाकर बाहर खड़ा कोई व्यक्ति अन्दर अखबार पढ़ रहे चेयरमैन को देख पाता. दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई चेयरमैन ने अपनी आदत के अनुसार नज़र अखबार पर ही टिकाए आगंतुक को परवेश की अनुमति प्रदान कर दी. थोड़ी देर बाद जब उनके पास कोई न आया तो उन्होंने दरवाजे की ओर देखा. दरवाजे की चौखट पर एक बिल्ली बैठी थी.
 
म्याऊँ...म्याऊँ...म्याऊँ....

चेयरमैन ने उसे दुत्कार भगा दिया और नजरें दोबारा अखबार में गडा लीं. उसी क्षण फिर किसी के पांवों की आहात मिली, साथ ही दरवाजे पर दस्तक भी. चेयरमैन का मन विक्षुब्ध हो उठा. अखबार को मेज पर जोर से पटकते हुए जोर से बोले
 
"कौन है, इस साली ने भी तंग कर रखा है"  

"मैं हूँ सर" युवती का स्वर था. चेयरमैन ने विस्फारित नेत्रों से युवती की ओर देखा. वह निम्नी थी. निम्नी लगातार दो साल से यूनिवर्सिटी में टॉप करती रही थी. विभाग के स्टूडेंट्स का कहना था कि चेयरमैन के साथ उसकी मिलीभगत है.

"सर, आपने मुझे बुलाया था?"
 
निम्नी ने चेयरमैन के बिलकुल करीब जाकर पूछा.
 
"हाँ..हाँ...तुम आ गयी हो...शाबाश बेटी..शाबाश..."
 
चेयरमैन अपने होंठों पर जीभ फेरते हुए उसकी पीठ सहलाने लग गए थे.
 
"सर, वह बात नहीं बन पाई"
 
निम्नी ने अपने दायें हाथ में पकड़ी फाइल मेज पर रख दी.

दरअसल मैंने सोचा बिल्ली है. बिल्ली सुबह से ही तंग कर रही थी, मेरा मतलब है काफी देर से..."
चेयरमैन अपना राग अलापने लग गए थे, "इसलिए मैंने कहा साली...साली कोई गालीं नहीं है"
निम्नी को उनका इस तरह से बात करना खल रहा था.

"सर, मैं यह बात नहीं कर रही हूँ. मैं तो डॉक्टर संतोष के बारे में कह रहे थी कि... " कहते हुए वह पास पड़ी कुर्सी पर बैठ गयी.
"मैं जानता हूँ जो तुम कह रही हो...लेकिन हमें भी तो अपनी भूल के लिए क्षमा मांगने का अधिकार है.        
 
इसके बाद वह खीं खीं करके हँसने लग गए थे. निम्नी भी अपने कई महीनों से ब्रश न किये पीले दांत दिखा रही थी.

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